उदयसिंह प्रथम
उदयसिंह प्रथम
| उदयसिंह प्रथम | |
|---|---|
| मेवाड़ के राणा | |
| मेवाड़ के राणा | |
| शासनावधि | १४६८ से १४७३ |
| पूर्ववर्ती | महाराणा कुम्भा |
| उत्तरवर्ती | राणा रायमल |
| निधन | १४७३ |
| पिता | महाराणा कुम्भा |
जीवनी
मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के बड़े पुत्र उदयकर्ण ने कुम्भलगढ़ में महाराणा को मारकर बदनोर के ठाकुर जेतसिंहजी के साथ मेरवाड़ा में ठाकुर श्री खंगारसिंहजी चौहान के यहां आकर शरण ली। यहां के ठाकुर ने उन्हें तीन माह तक बरार (राणारेल) में रखा और १० दिन तक बरसावाड़ा में रखा। जब महाराणा का सोलह राव और बत्तीस उमरावों के साथ सन्धि हो गई तो श्री खंगारसिंह चौहान अपने साथ उदयकर्ण को लेकर उदयपुर दरबार में हाजिर हुए, तो उदयपुर के राजकवि ने श्री खंगारजी की प्रशंसा में निम्न उक्तियाँ कहकर सम्मानित किया –"सोलह सामन्त, सौ शूरमा, हुणि बरसावाड़े वाग।
राण पहुँचाया चहुवान रजपुतां उदको वदियो आग।।
रण छेला रण बावला, कुले सुधारण काज।
राणी जाया चहुवान रजपुतां लाख-लाख समराज।।"
राजपूताना भूमि को उसके योद्धा पुत्रों की साहस और बहादुरी के रूप में जाना जाता है; उनके खून से रंगी हुई रेगिस्तान की मिट्टी जो इन महान योद्धाओं के लिए जानी जाती है और उनकी महिमा का प्रतीक है। मेवाड़ की धरती पर कई महान योद्धाओं ने जन्म लिया है और शिष्टता, वीरता और स्वतंत्रता के लिए जाने जाते थे लेकिन हर सिक्के का एक और पहलु होता है और हर युग में कुछ अजीब जरूर देखने को मिला है।
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